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चंबल इलाके में घड़ियालों पर संकट, नदी में पानी और रेत की कमी बड़ी वजह      2017-11-09 09:42:53
 

 व्यूज़ मीडिया ब्यूरो अक्सर लोग घड़ियाल को भी मगरमच्छ की तरह खतरनाक समझ लेते हैं। यह एक बहुत बड़ी गलतफहमी है। मगरमच्छ द्वारा लोगों पर जानलेवा हमला किए जाने की खबरें पूरी दुनिया से आती ही रहती हैं।. इसलिए अज्ञानतावश लोग घड़ियाल को भी जानलेवा हमला करनेवाला आदमखोर मगरमच्छ समझ लेते हैं। इसका कारण है कि एक तो ये देखने में मगरमच्छ की तरह होते हैं और दूसरे, इनका आकार भी बहुत बड़ा होता है। घड़ियाल मनुष्यों को कुछ भी नुकसान नहीं पहुंचाते, फिर भी इनका भीमकाय आकार लोगों को डराने के लिए काफी होता है। लेकिन घड़ियालों के लिए उपयुक्त चंबल में रेत की कमी की वजह से उन पर संकट मंडरा रहा है। लेकिन उससे पहले हम आप को एक पौराणिक कथा के बारे में बताएंगे जिससे घड़ियालों के बारे में जानकारी मिलती है। पौराणिक कथाओं में घड़ियाल को कभी मां गंगा की सवारी तो कभी जलदेवता वरुण की सवारी होना बताया जाता है। माना जाता है कि गीता के दसवें अध्याय में कृष्ण ने अपना वर्णन करते हुए जलचरों में स्वयं को घड़ियाल कहा है। लेकिन मुहावरों में ‘घड़ियाली आंसू’ फिर भी एक नकारात्मक अर्थ में ही प्रयोग होता है। घड़ियाली आंसू का यह मुहावरा चाहे जैसे भी बना हो, लेकिन घड़ियालों के पूरी तरह लुप्त हो जाने के बाद कहीं हम्हीं इनके प्रति सच्चे आंसू बहाते न नजर आएं।

घड़ियालों के अस्तित्व पर संकट
चंबल में घड़ियालों के अस्तित्व पर सबसे बड़ा संकट आया है। इस साल चंबल नदी में नवंबर महीने से ही पानी कई जगहों पर 2 से 5 फीट तक रह गया है। बाढ़ न आने से किनारों की सारी रेत नदी के बीच में आ गई है। यानी इस साल घड़ियालों के पास कोई घर नहीं है। घड़ियालों को धूप सेकने और अंडे देने के लिए 1 से डेढ़ मीटर मोटी रेत की परत चाहिए होती है। लेकिन इस बार किनारों में पर दो से ढ़ाई फीट ही रेत है। इस स्थिति में घड़ियालों को अंडे देने में भी परेशानी आएगी। इस संकट को गंभीरता से लेते हुए वन विभाग मुरैना ने वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट से मदद मांगी है। वन विभाग की मानें तो चंबल में किसी भी तरह पानी छुड़वाना जरूरी हो गया है।
 
 
 
चंबल नदी में इस समय 1400 के करीब घड़ियाल हैं। 30 साल में पहली बार ऐसा हुआ जब चंबल नदी नवंबर में ही सूखने लगी है। हर साल चंबल नदी में बारिश के दौरान जल स्तर 136 से 139 मीटर तक पहुंच जाता था। लेकिन इस साल यह जल स्तर 130 मीटर भी नहीं पहुंच पाया था। नदी में पानी की कमी और वेग कमजोर होने से किनारों की सारी रेत धीमे बहाव के कारण नदी के बीच के गड्ढों में जमा हो गई है। हाल ही में नदी में हुए 65 किलोमीटर के सर्वे के दौरान यह बात वन विभाग को पता चली। नदी के बीच धार में इतनी रेत एकत्रित हो गई है कि यहां बोट चलना भी मुश्किल हो गई है। जबकि किनारे रेत से खाली दिखाई दे रहे हैं। नदी के पारिस्थितिक तंत्र में यह बहुत बड़ा बदलाव माना जा रहा है। क्योंकि फरवरी महीने में वन विभाग नदी में बोट के जरिए ही जलीय जीवों की गणना करता है। जबकि नवंबर महीने में ही नदी में बोट चलने लायक पानी नहीं है।
घड़ियालों को चाहिए इतना रेत
चंबल अभयारण्य पर पिछले 30 सालों से शोध कर रहे विशेषज्ञ डॉ. ऋषिकेश शर्मा के मुताबिक घड़ियाल रेत में अंडे देते हैं। इसके लिए घड़ियाल 45 से 60 इंच तक गहरे गड्ढे खोदते हैं। धूप सेंकने के लिए घड़ियालों को डेढ़ मीटर ऊंचे रेत के टीले चाहिए। डॉ. शर्मा के अनुसार रेत भी कम है और पानी भी। ऐसे में घड़ियालों की नेस्टिंग साइड खराब होने का खतरा बढ़ गया है। मजबूरन घड़ियाल कम रेत या मिट्टी खोदकर अंडे देंगे। जिससे अंडों को उचित तापमान नहीं मिलेगा और अंडे खराब हो जाएंगे।
डब्ल्यूआईआई लेगा रीडिंग 
पानी की कमी और किनारों पर रेत न आने से वन विभाग के होश उड़ गए हैं। वन विभाग ने डब्ल्यूआईआई को इस संकट से अवगत कराया है। इसके बाद डब्ल्यूएलआई नवंबर महीने में चंबल के जल स्तर की रीडिंग लेगा। इसके बाद तय होगा कि केंद्र सरकार को बताया जाए कि कोटा बैराज से चंबल में पानी छोड़ना आवश्यक है।
घड़ियालों पर यह संकट 
रेत कम होने से घड़ियास अंडे नहीं दे पाएंगे जहां रेत और पानी शेष बचेगा वहां घड़ियालों की भीड़ हो जाएगी, जिससे भोजन का संकट खड़ा होगा । अंडे खराब होने से हैचिंग प्रभावित होगी, घड़ियाल क्राइसिस की संभावना भी बढ़ जाएगी । फरवरी तक नदी लगभग सूख जाएगी, जिससे डॉल्फिन पर पर संकट आएगा।
 
जानकार की राय
चंबल के बरवासिन घाट की नेस्टिंग साइट बेकार हो गई है। टिकरी रिठौरा, डांग बसई जैसी साइट पर भी रेत कम है। ऐसे में घड़ियाल वहां एकत्रित होंगे जहां रेत और पानी कुछ ज्यादा होगा। यहां भीड़ बढ़ने से घड़ियालों को भोजन कम मिलेगा। हैचिंग में गिरावट आएगी । ऐसा पहली बार देखने में आ रहा है। 
डॉ. ऋषिकेश शर्मा, वन्यजीव विशेषज्ञ
सर्वे के दौरान पाया कि नदी में बोट नहीं चल पा रही। रेत किनारों की जगह नदी के बीच में आयी है। घड़ियालों को बचाने के लिए नेस्टिंग साइट पर आसपास से रेत लाकर डलवाने पर विचार कर रहे हैं। डब्ल्यूआईआई को भी अवगत कराया है। वे भी जल्दी ही पानी के स्तर की रीडिंग लेंगे। आवश्यक हुआ तो चंबल में पानी छुड़वाने के लिए भी केंद्र से आग्रह करेंगे।
 
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